पिछले कुछ महीनों के दौरान भाजपा, बसपा, सपा और कांग्रेस की रणनीतियों से अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि चुनाव में ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने को लेकर सियासी दल किस कदर बेचैन हैं। चुनाव नजदीक आते-आते जमीन पर और भी मुखर होने की संभावना है। विश्लेषकों की मानें तो बसपा और सपा को बारी-बारी से आजमा चुका यह वर्ग इस बार अन्य विकल्प पर पूरी गंभीरता से विचार कर रहा है।

जानकार बताते हैं कि प्रदेश में ब्राह्मण संख्या के लिहाज से दलित, मुस्लिम और यादव से कम हैं। सूबे की आबादी में करीब 10 फीसदी हिस्सेदारी वाले ब्राह्मणों की प्रदेश के मध्य व पूर्वांचल के करीब 29 जिलों में अहम भूमिका मानी जाती है, लेकिन इनका प्रभाव वहां भी महसूस होता है जहां ये कम तादाद में होते हैं।

लोगों ने ब्राह्मणों को बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को स्वीकार करते हुए देखा है। इस सोशल इंजीनियरिंग के पहले बसपा का ब्राह्मणों के प्रति व्यवहार जगजाहिर रहा है। लेकिन ब्राह्मणों ने जब देखा कि बसपा की सोशल इंजीनियरिंग से उन्हें सम्मान तक हासिल नहीं हुआ तो उन्होंने रास्ता बदलने में देर नहीं की। अब मौजूदा सपा सरकार के अनुभव भी उनके सामने है। अगले चुनाव के लिए अब ये फिर अपनी भूमिका पर गौर कर रहे हैं। चूंकि ये समय और परिस्थिति पर सोच-विचार कर निर्णय करते हैं लिहाजा सभी राजनीतिक दल अपनी रणनीति बनाने में इन्हें ध्यान में रखते हैं।