नई दिल्ली: वर्ष 1991 में आर्थिक उदारीकरण लागू होने के बाद भारत के कारोबारी रिश्ते अगर किसी देश के साथ सबसे ज्यादा प्रभावित हुए तो वह रूस है। तब तक रूस भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार था लेकिन आज की तारीख में रूस-भारत का द्विपक्षीय कारोबार महज 10 अरब डालर का है जबकि अमेरिका के साथ भारत का कारोबार 100 अरब डॉलर को पार कर गया है। भारत-रूस की अहम बातचीत के बीच रहा कारोबार पर फोकस चीन के साथ कारोबार 70 अरब डॉलर के करीब है। ऐसे में भारत और रूस आपसी कारोबार के हालात की नए सिरे से समीक्षा कर रहे हैं। शनिवार को नई दिल्ली में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रूस के उप प्रधान मंत्री दिमित्री रोगोजिन की अगुवाई में आर्थिक सहयोग से जुड़े हर मुद्दे पर बात हुई। माना जा रहा है कि इस बैठक में 30 अरब डॉलर के द्विपक्षीय कारोबार के लक्ष्य को हासिल करने को लेकर दोनो पक्षों में अहम बातचीत हुई है। भारत और रूस ने पहले ही वर्ष 2025 तक द्विपक्षीय कारोबार के लक्ष्य को 30 अरब डॉलर करने और द्विपक्षीय निवेश के स्तर को बढ़ा कर 15 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा हुआ है। लेकिन अभी दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय कारोबार की स्थिति बेहद खराब है। भारत और रूस की अर्थव्यवस्था का आकार संयुक्त तौर पर 3.3 लाख करोड़ डॉलर का है। लेकिन भारत के कुल कारोबार में रूस की हिस्सेदारी महज एक फीसद है जबकि रूस के कारोबार में भारत की हिस्सेदारी 1.2 फीसद की है। दोनो देशों के बीच द्विपक्षीय कारोबार को नई दिशा देने के लिए इंडिया यूरेशियन इकोनोमिक फ्री ट्रेड जोन बनाने पर भी बात हो रही है। इसमें इन दोनों देशों के अलावा बेलारुस, अर्मेनिया, कजाखस्तान व किर्जिगस्तान जैसे कुछ अन्य देश शामिल होंगे। लेकिन इसको लेकर बातचीत की प्रगति की रफ्तार बेहद धीमी है। जानकार मानते हैं कि ईरान में भारत की मदद से तैयार हो रहे चाबहार पोर्ट का काम होने के बाद भारत के लिए इन देशों में के साथ कारोबार करना ज्यादा आसान हो जाएगा। स्वराज और रोगोजिन के बीच इस बारे में भी विमर्श हुआ है। सनद रहे कि जून, 2017 में सेंट पीट्सबर्ग में भारत-रूस सालाना बैठक में भी आपसी कारोबारी रिश्ते को लेकर बेहद अहम बातचीत हुई थी। तब पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने कारोबारी रिश्तों में सुस्ती को दूर करने की बात कही थी। भारत रूस के ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ चढ़ कर निवेश करने को तैयार है लेकिन वहां रूस की तरफ से उसे पूरा सहयोग नहीं मिलता। इसकी एक वजह यह बताई जाती है कि रूस उसे गैर आधिकारिक तौर पर भारत के साथ रक्षा सौदों के साथ जोड़ता है। भारत अभी तक रूस के तेल उद्योग में 5.5 अरब डॉलर का निवेश कर चुका है। देखना है कि इन सब मुद्दों को स्वराज और रोगोजिन के बीच हुई बातचीत कितना सुलझा पाती है।