यह कहानी ऐसे व्यक्ति कि है जिसने जान पर खेल कर दूसरों की मदद की....

moral of the story

मोहन बहुत दयालु व्यक्ति था. वह हर परिस्थिति में लोगों की मदद करने के लिए तत्पर रहता था. एक बार मोहन सड़क पर यूं ही घूम रहा था कि अचानक उसे एक पर्स गिरा दिखाई पड़ा. उसने पर्स उठाया और देखा कि वह खाली है. उसी क्षण एक महिला पुलिसवाले के साथ वहां पहुंची पुलिसवाले ने मोहन के हांथ से पर्स लेकर उसे हिरासत में ले लिया. महिला लगातार मोहन से पूछ रही थी कि तुमने पर्स से पैसे निकाल कर कहां छिपा दिए, लेकिन मोहन हर बार विनर्मता से ज़वाब देता रहा कि मुझे यह पर्स बिल्कुल खाली मिला है. महिला मोहन पर चिल्लाते हुए बोली, कृपया मेरा पैसा मुझे वापस कर दो, वह मेरे बेटे की स्कूल फ़ीस है. महिला के इस तरह बोलने पर मोहन ने महसूस किया कि वह महिला वास्तव में बहुत दुखी है. यह देखकर बिना देर किए मोहन ने अपना सारा पैसा उस महिला को देते हुए कहा- आप यह रखिये और आपको जो असुविधा हुई उसके लिए मुझे क्षमा करें. पर्स और पैसा लेकर महिला वहां से चली गई. पुलिसवाला कुछ सवाल पूछने के लिए मोहन को साथ ले गया. पैसा पाकर महिला बहुत खुश हुई लेकिन जब उसने पैसे गिने तो उन्हें दोगुना पाकर चकित रह गई. एक दिन वह महिला जब अपने बेटे कि स्कूल फ़ीस जमा करने जा रही थी तो उसने देखा कि एक दुबला-पतला सा व्यक्ति उसके पीछे-पीछे चल रहा है. उसने सोचा कि वह उससे पैसे छीन सकता है. उसने पास खड़े एक पुलिसवाले से शिकायत की. इत्तेफाक से यह वही पुलिसवाला था. जो पर्स कि जाँच पड़ताल के वक़्त था. महिला ने अपना पीछा करने वाले व्यक्ति के बारे मे उसे बताया. अचानक उन्होंने देखा कि वह व्यक्ति गिर गया है. वे दोनों उसकी तरफ भागे और देखा कि यह तो वही शख्स था जिसे कुछ दिन पहले पर्स चुराने के आरोप में हिरासत में लिया गया था. वह काफी कमज़ोर लग रहा था. उसे देख महिला अचंभित हुई. पुलिसवाले ने महिला से कहा- उस दिन इस शख्स ने आपको आपका पैसा नहीं लौटाया था बल्कि अपना पैसा आपको दिया था. यह चोर नहीं है लेकिन जब उसने आपके बेटे कि स्कूल फ़ीस के बारे मे सुना तो दुखी होकर अपने पैसे आपको दे दिया. उन दोनों ने मोहन को उठाया. तब मोहन ने महिला से कहा- आप कृपया जाइए और बेटे कि स्कूल फ़ीस का भुगतान करिए. मै आपके पीछे इसलिए आ रहा था कि कोई आपके बेटे कि फ़ीस ना चुरा ले. मोहन कि बात सुनकर महिला निःशब्द रह गई.

Moral Of The Story- "जो हमें दिखाई देता है, ज़रूरी नहीं कि वह सच भी हो."