सुनील रमन विपक्षी दलों के पास अपनी पसंद का राष्ट्रपति लाने के लिए पर्याप्त संख्या न होने से यह संभावना बढ़ गई है कि पीएम नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति पद के लिए एक ​दलित-आदिवासी उम्मीदवार उतार दें. फर्स्टपोस्ट को पार्टी सूत्रों ने बताया कि मोदी सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्षी दलों की आम सहमति का उम्मीदवार उतारने के पक्ष में नहीं हैं. इसका कारण बताया जा रहा है कि पहली बार बीजेपी के नेतृृत्व वाली सरकार के पास पूर्ण बहुमत है और वो पसंदीदा उम्मीदवार ला सकती है. साल 2015 में पीएम मोदी ने ओडिशाा से आदीवासी नेता द्रौपदी मुरमु को झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया था. इससे पहले देश में किसी आदिवासी महिला ने ये पद नहीं संभाला था. एक साथ कई मकसद पूरे राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के पद पर दलित-आदिवासी उम्मीदवार लाने से बीजेपी के एक साथ कई निशाने साध सकती है. पहला मकसद आरएसएस से राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति उम्मीदवार लाना संभव हो सकता है. दूसरा, बीजेपी ऐसा करके इतिहास बनाना चाहेगी और इसे दलित और इसके जरिए आदिवासी मतों में घुसपैठ मजबूत करना चाहती है. इससे पार्टी विपक्षी दलों की गैर-दलित/ आदिवासी छवि बनाना चाहती है. यह 2019 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर बीजेपी का समर्थन आधार बढ़ाने के लिए किया जा रहा है. ये तीन बन सकते हैं बीजेपी के उम्मीदवार ऐसे में राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर तीन नाम उभरकर सामने आ रहे हैं. इसमें पहला और सबसे मजबूत दावेदारी वाला नाम करिया मुंडा का है जो पूर्व उपाध्यक्ष और झारखंड से आदिवासी हैं. दूसरा नाम थवर सिंह गहलोत का है जो मोदी कैबिनेट में सामाजिक न्याय मंत्री हैं और मध्य प्रदेश से दलित नेता है. वहीं, इसमें तीसरा नाम द्रौपदी मुरुम का भी है.