कोलकाता. पश्चिम बंगाल की चावल मिलें प्लास्टिक के बोरे का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रही हैं। इससे एक तरफ केंद्रीय कानून का जमकर उल्लंघन हो रहा है, वहीं राज्य की जूट मिलों के अस्तित्व पर भी सवाल उठ रहे हैं।

इस तरह की शिकायत व मंत्रालय के अधीन संस्था जूट आयुक्त कार्यालय को मिली है। जूट मिल मालिकों का संगठन ईज्मा इस बारे में राज्य सरकार से एक बार फिर हस्तक्षेप की गुहार लगाने की तैयारी में है। जूट मालिक इसके पीछे राज्य सरकार की उदासीनता को प्रमुख कारण मान रहे हैं। उल्लेखनीय है कि गत वर्ष जूट पर गठित मंत्री समूह ने चावल मिलों में अधिक से अधिक जूट के बोरे के इस्तेमाल करने के मुद्दे पर बैठक की थी।

उक्त बैठक में मंत्री समूह के अलावा तत्कालीन जूट आयुक्त सुब्रत गुप्ता, राज्य के खाद्य सचिव, राइस मिल्स एसोसिएशन और इंफोर्समेन्ट ब्रांच के शीर्ष अधिकारी उपस्थित रहे। राज्य सरकार ने चावल मिलों के लिए 70 फीसदी जूट के बोरे का इस्तेमाल करने पर जोर दिया था। सूत्रों ने बताया कि पश्चिम बंगाल सरकार जूट उद्योग की समस्याओं के लिए हमेशा केंद्र को कटघरे में लाती रही है। हकीकत यह है कि जूट की खेती और सबसे अधिक जूट मिलें पश्चिम बंगाल में ही है।

केंद्रीय व मंत्री स्मृति ईरानी ने गत वर्ष नवम्बर में कोलकाता प्रवास के दौरान जूट उद्योग से जुड़े सभी भागीदारों की बैठक में स्पष्ट संकेत दिया था कि केंद्र जूट उत्पादक किसानों, श्रमिकों और उद्योग के हितों को ध्यान में रखते हुए जेपीएम एक्ट-1987 की रक्षा करने के पक्ष में है। सूत्रों ने बताया कि चावल मिलें गत वर्ष बैठक में लिए निर्णय के विपरीत 100 फीसदी प्लास्टिक के बोरे का इस्तेमाल कर रही हैं।